विदेश यात्रा योग

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विदेश यात्रा योग

 

ज्योतिष सिद्धान्तों में विदेश यात्रा का तात्पर्य जन्मस्थान से १००-२०० किलोमीटर परे जाकर बसना भी माना जाता है, क्योंकि परदेस तब के जमाने में अपने राज्य के बाहर जाना ही होता था, किन्तु हस्तरेखा में चन्द्र पर्वत पर रेखाएँ और कतिपय ग्रह योग से, यह निश्चित किया जा सकता है, जातक समुद्र यात्रा करेगा या नहीं?
समुद्रपार यात्रा का सीधा अर्थ दूर देशो की यात्रा ही हुआ….

ज्योतिष के कतिपय योग निम्न है….

१.एकादश(लाभ,आय) भाव व द्वादश (विदेश) में चर राशि हो(१,४,७,१०) और उनके स्वामी भाव में ही विद्यमान हो।

२. लग्नेश(स्वयं) भाग्य स्थान(नवम) में हो और द्वादश के स्वामी से संबंध बनाए।

३. द्वितीयेश, लग्नेश, भाग्येश,आयेश में से कोई द्वादश में हो।

४. लग्न का स्वामी भाग्य में और भाग्य भाव का स्वामी लग्न में स्थित हो।

५. चतुर्थ का स्वामी, सप्तम का स्वामी और द्वादश का स्वामी, इनमें आपस में संबंध हो तो, जातक जीवन में एक बार समुद्र पार यात्रा अवश्य करता है।

६.नवम भाव  स्थित राहू  और वृष राशी में स्थित राहू  भी विदेश भेजता है..

नोट:- इन योगो से ही, आयात-निर्यात(export & import) व्यापार भी देखा जा सकता है।

राम॥

 
 
 

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