वैवाहिक जीवन..(कैसे करें दोष पर विचार)

DSC_0090

वैवाहिक जीवन कैसा होगा और दोषयुक्त होगा या दोषरहित इसका विचार कैसे किया जाए इसे हम इस लेख से समझेगे.. पाठकों के प्रश्न आमंत्रित हैं..!

दाम्पत्य जीवन सुखमय होगा या दुःख से भरा ये निर्भर करता है सप्तम भाव पर..सप्तम में स्थित राशि, सप्तम भाव पर शुभाशुभ ग्रहों की दृष्टि.. ये निर्धारित कर देगी की वैवाहिक जीवन में क्या होगा.. जैसे सूर्य की स्थिति विच्छेद्कारक हुआ करती है..तलाक की सम्भावना बना करती है..राहू की उपस्थिति वैवाहिक जीवन में भ्रम की सी स्थिति बना देती है..! उच्च का मंगल सप्तम भाव में वियोग करवा देगा.. ऐसे ही शनि विलम्ब से विवाह या मर्जी की जगह होते होते रह जाने का योग बनाता है..!
.
सप्तमेश की स्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है..क्युकी अगर सप्तम भाव दूषित होने के साथ साथ अगर सप्तमेश भी पीड़ित है तो स्थिति काबू से बाहर हो जाती है..! एक और गुप्त बात है.. जो बहुत कम जगह वर्णित है और कोई सहज में बताएगा भी नहीं.. सप्तमेश उच्च होकर अपने से आठवे गया हो.. मिथुन लग्न में ऐसा होता है.. तो भी वैवाहिक जीवन में बहुत पीड़ा दिया करता है.. कभी कभी तो जीवन साथी की मृत्यु का कारण बनता है..!
सप्तमेश के बलाबल, उसकी राशि और भाव सापेक्ष शुभाशुभ स्थिति उसका बाकी ग्रहों से सम्बन्ध आदि से वैवाहिक जीवन का आंकलन सरलता से होता है..!
.
इसके अतिरिक्त वैवाहिक जीवन के कारक शुक्र की स्थिति, उसकी भाव सापेक्ष स्थिति, बलाबल और मंगल, बुध, राहू व चन्द्र से सम्बन्ध भी देखना चाहिए.. दूषित शुक्र चरित्र का दोष देता है जो अपने आप में ही विवाह के लिए ताबूत की कील साबित हुआ करता है.. शुक्र अस्त हो और सप्तम में शनि पर मंगल की दृष्टी हो तो ऐसी कन्या का चरित्र संशययुक्त हुआ करते हैं..!
.
इन सब के साथ द्वितीय भाव क्युकी वो परिवार का भाव है..साथ ही, सप्तम से आठवे होने से जीवनसाथी की मृत्यु का भी भाव है..अतः उसका भी अध्ययन उपरोक्त तरीके से करें..
पंचम भाव को भी पढना बहुत जरुरी है क्युकी संतति होना भी सुखद वैवाहिक जीवन की निशानी हुआ करता है..!
इसके अतिरिक्त आठवे भाव से जातक की आयु निर्णय भी कर लिया जाए क्युकी ये भाव आयु के साथ साथ सप्तम से द्वितीय होने से वैवाहिक जीवन पर भी पूरा असर रखता है..
अब बात करतें हैं.. शय्या सुख की..ये बारहवे भाव से देखिये.. यौन तृप्ति या कहें काम नामक पुरुषार्थ की सिद्धि..! शुभ स्थिति में ये गोपनीय पलों के सुखद होने का द्योतक है.. और अशुभ होकर न सिर्फ किसी दोष की और इंगित करता है बल्कि ये किसी तीसरे की घुसपेठ का भी इशारा है..! सप्तम से छठे होने से जीवन साथी का शत्रु यानी सौतन का भाव भी यही हुआ..! यहाँ शनि राहू, केतुमंगल और शुक्र को ठीक नहीं माना जाता..!
लेख मात्र एक संकेत है इस विषय पर.. ये विषय अपने आप में बहुत विस्तृत है और कई पुस्तकें लिखी जा सकती है किन्तु उपरोक्त सूत्रो पर चिंतन करके भी आप किसी भी कुंडली की वैवाहिक स्थिति परख सकते हैं..
अंत में दो बातों का ध्यान रखें.. पुरुष की कुंडली में शुक्र और स्त्री की कुंडली में गुरु की शुभता या अशुभता उसकी वैवाहिक जीवन की स्थिति का निर्धारण करते हैं.. और दूसरी बात.. मंगल के प्रभाव को भी जांच लेना चाहिए..! इति!!
राम!!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *