सूर्य की अन्य ग्रहों से युति एवं विभिन्न भावो में फल

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सूर्य की अन्य ग्रहों से युति का सामान्य फल

सूर्य ग्रहों का राजा है इसलिए जब ये किसी अन्य ग्रह से युति करता है तो विशिष्ट फल हुआ करते हैं ..जब गृह अस्त हो जाए तो स्थिति सूर्य के पक्ष की हो जाया करती है लेकिन अगर अस्त न हो तो ये निम्न योग बन करते हैं…!

सूर्य और चन्द्र की युति :- व्यक्ति अभिमानी पराक्रमी कपटी स्वाभाव युक्त होगा और पत्थरो की वस्तुओं का व्यापर संभव है … आँखों की समस्या हो सकती है !


सूर्य और मंगल की युति:- तेजस्वी श्रेष्ठ ,लड़ाई झगडे पसंद करने वाला , बलवान ,और अपने भाई बंधू और दोस्तों के लिए कुछ भी कर गुजरने वाला!


सूर्य और बुध की युति :- बुद्धिमान और बहुत ही तरीके से अपना काम निकलने में माहिर..! अपने पिता का चाहता और बड़ी बड़ी पहुंच रखने वाला ..


सूर्य और गुरु की युति :- परोपकारी और पुरोहित कर्म में कुशल.. उच्च श्रेणी के लोगो से जान पहचान …नीति सम्मत बात करने वाला .. उसूलो वाला ..


सूर्य और शुक्र की युति :- नाट्यकार , संगीत और शास्त्र निपुण .. अपोजिट सेक्स के प्रति बहुत आकर्षित .. पुरुष हुआ तो स्त्री से धन प्राप्त करेगा .. आँखों की कमजोरी और मधुमेह की सम्भावना …


सूर्य और शनि की युति :- धातु कर्म में कुशल और वृद्धाचरण … यानि बहुत जल्दी बड़े बड़े लोगो की तरह बाते करे और अपनी उम्र से ज्यादा गम्भीर हो..
पिता पुत्र में दूरी हो जाया करती है..!

सूर्य और  राहू और  केतु  की  युतियाँ  ग्रहण  प्रकरण में  आती  है  अतः  एक  वितरित  प्रथ्थक  पोस्ट इसपर बनेगी..!

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सूर्य ग्रह के विभिन्न भावो में फल।

:- प्रथम भाव स्थित सूर्य, जातक को शक्तिशाली, सक्रिय एवं लक्ष्य पर केन्द्रित बनाता है।
ऐसे जातक किसी के नीचे काम करना या हस्तक्षेप करना पसन्द नहीं करते।
तानाशाही और कहीं कहीं क्रूरता आ जाती है स्वभाव में। इस तरह के जातकों में राजा और पिता दोनो का सा स्वभाव होता है।

:- द्वितीय भाव स्थित सूर्य अध्यात्म के लिए अच्छा है, भौतिक सुखो के साथ मानसिक कठनाईया लेकर आता है।
ऐसे स्थिति में यदि शनि देखे इसे तो निर्धनता का योग बना देता है।

:- तृतीय भाव में सूर्य विशिष्ट प्रभाव दिखाता है की व्यक्ति अपने भाई बहनो से अधिक अपने मित्रो से प्रेम करता है। पराक्रमी होता है। नैतिक होता है और अपरिमित साहसी भी।

:- चतुर्थ में सूर्य ह्रदय के लिए अच्छा नहीं होता। रोग और उथल-पुथल दोनो रहते हैं। मातृसुख की कमी रहती है और असन्तोष से जीवन व्याप्त रहता है।

:- पंचम में सूर्य अध्यात्मिक उत्थान के लिए आदर्श स्थिति है परन्तु सन्तान सुख में कमी करती है। ऐसा व्यक्ति वेदिक वादी या दर्शन शास्त्री हो सकता है।

:- छठे भाव सूर्य अतिबली होता है। यहाँ शत्रुनाश करता है तथा धन संपदा प्रदान करता है। कठनाईयो से लड़ने की क्षमता प्रदान करता है।
मुकदमें अवश्य होते हैं ऐसे व्यक्ति के।

:- सप्तम का सूर्य वैवाहिक जीवन के लिए अशुभ है। ऐसा पुरुष परस्त्री में आसक्त हो सकता है। तलाक आदि की संभावना बन जाती है। यहाँ भी वैराग्य और साधना हेतु यह स्थिति उत्तम है।

:- अष्टम में स्थित सूर्य हड्डी की पीड़ा अवश्य देता है। धोखे खाने पड़ते हैं परन्तु जातक में सेनापति से गुण हुआ करते हैं। आयु के लिए शुभ स्थिति है और योग मार्ग में रूचि विशेष होती है ऐसे जातक की।

:- नवम में सूर्य हो तो तीर्थयात्रा खूब होती है। धार्मिकता बढी रहती है और कठिन साधनाओं में भी साहस का संचार हो मदद मिलती है।
यह जातक अहम् से ग्रस्त हो सकता है।

:- दशम में सूर्य सम्पूर्ण ही शुभ हुआ करता है। राज अधिकारी बनाता है। ज्ञानमार्गी और कर्मकांड से विमुख बनाता है। जातक विख्यात, धनी और शक्तिशाली होता है।

:- एकादश स्थित सूर्य जातक को धनी , सम्मानित बनाता है। जातक उत्तम वाहन और उत्तम निवास वाला होता है। उच्च अधिकारी मित्र होते हैं और पदोन्नति के बहुत अवसर प्राप्त होते हैं।

:- द्वादश स्थित सूर्य अनेको राजयोगो को भंग करता है। वैवाहिक जीवन का अहम् भाग शैय्या सुख नष्ट हो जाया करता है। दूसरे योग हो तो जातक कृपण होता है। भौतिकता के लिए यह स्थिति विपरीत है परन्तु अध्यात्म में यही परिस्थितियां गति प्रदान करती है। जातक व्यक्तिगत सुख से उपर उठ कर परोपकार और दूसरो का दर्द उठाने में लग जाता है। चन्द्र शुभ हो तो हातिम ताई सा हो जाता है।
राम॥

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